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बौद्ध और न्याय की दार्शनिक सहयात्रा

-अनुराधा मलाती

भारतीय दार्शनिक चिंतन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी खण्डन-मण्डन की परंपरा रही है। इसी खण्डन-मंडन के परिणामस्वरूप सूत्र, भाष्य, वार्तिक, टीका एवं प्रकरणादि ग्रन्थों के माध्यम से भारतीय परंपरा में व्याख्याओं, पुनर्व्याख्याओं से दर्शन की यात्रा, उसका विकास युक्तियुक्त रूप से अनवरत वर्द्धमान रही है। इसमें न्याय और बौद्ध विचारधारा के मध्य एक हजार से अधिक वर्षों का वैचारिक संघर्ष इसका ज्वलंत उदाहरण है। सत्-विषयक दो भिन्न प्रकार की तत्वमीमांसीय दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती हुई दोनों दार्शनिक विचारधारा आरंभ से ही एक दूसरे के विरोध में यूँ तो पनपी, किंतु परस्पर एकदूसरे को विकास एवं परिष्कार की प्रेरणाएं भी देती रहीं। बौद्ध धर्म का आविर्भाव ही यद्यपि वैदिक परम्परा के प्रति असहमतियों को लेकर हुआ है किन्तु दोनों विचारधारा के दार्शनिक सम्प्रदायों के मध्य खंडन-मण्डन का आरंभ विधिवत रूप से कह सकते हैं कि ‘नागार्जुन’ से हुई। नागार्जुन अपने चतुष्कोटिक द्वन्द्वन्याय की सर्वसंहारक शैली में वैदिक और बौद्ध दर्शन के (भी) सम्प्रदायों की स्थापनाओं का खण्डन करते हैं। नागार्जुन से प्रारंभ हुए इस ऐतिहासिक वाद-विवाद का प्रवाह कई ग्रंथों के सृजन से होते हुए रत्नकीर्ति के “उदयन निराकरणम्” नामक ग्रंथ पर रुकता है। अब इस रुके हुए ज्ञान-जल-राशि को पुनः प्रवाहित करने का उत्तरदायित्व नैयायिकों पर है अर्थात उदयन निराकरणम् का प्रत्युत्तर दिया जाना शेष है। तथापि वैदिक दर्शन में न्याय दर्शन ने इस वैचारिक संघर्ष को लंबे समय तक चलायमान रखा, यही कारण है कि न्याय और बौद्ध दर्शन के इस वैचारिकता का एक व्यवस्थित इतिहास दर्शन जगत के पास उसके महत्वपूर्ण थाती के रूप में उपलब्ध हो सका। इसमें हम यह नहीं कह सकते कि न्याय का विकास बौद्धों से हुआ या बौद्ध का विकास न्याय के कारण हुआ। अपितु दोनों परंपराओं का विकास और परिष्कार एक-दूसरे के द्वारा हुआ। खण्डन-मण्डन की इस यात्रा को और भी गति मिली तथा दार्शनिक चिंतन का विकास और समृद्ध हुआ जब इसमें मीमांसकों और अद्वैत वेदांत का योगदान मिला। इस वैचारिक युद्ध में बौद्धों की ओर से दो तरफा प्रहार हुए जिसमें पहला प्रहार नागार्जुन के द्वारा हुआ जिसका संदर्भ विज्ञजन ‘विग्रहव्यावर्तनी’ तथा ‘वैदल्यसूत्र’ नामक ग्रन्थों में देख सकते हैं। यह प्रहार,कह सकते हैं कि अपने स्वरूप में विध्वंसात्मक था। वैदल्यसूत्र में नागार्जुन प्रतिज्ञावाक्य में कहते हैं कि—तर्क ज्ञानाभिमाने वादं यः कुर्त्तमिच्छति।तस्यांहकार हानाय वच्मि वैदल्यसूत्रकम्।। इस प्रहार का उत्तर कह सकते हैं कि वात्स्यायन कृत गौतमसूत्र भाष्य में मिलता है। जहां वे न्याय की स्थापनाओं कोपुनर्गठित करते हैं। दूसरी ओर बौद्ध आचार्य दिङनाग ( नागार्जुन के इतर संसोधनात्मक शैली एवं स्वपक्ष की युक्तियुक्त स्थापना का उद्देश्य) ने भी न्याय को लक्षित करते हुए ‘प्रमाणसमुच्चय’ नामक ग्रन्थ की रचना की,जिसमें उन्होंने नैयायिकों को “कुतर्कसंभ्रान्तजन” (देखें—-प्रमाणसमुच्चय ग्रन्थ, 1) कहा है और नैयायिकों के प्रमाणशास्त्रीय अभ्युपगमों का खण्डन किया; जिसके प्रत्युत्तर में उद्योतकर ने “न्यायवार्तिक” ग्रन्थ की रचना की। उद्योतकर बौद्धों को कुतार्किक(देखें—- न्यायवार्त्तिक,1/1/1) कहते हैं और उनके अज्ञाननिवृत्ति को ग्रन्थ का लक्ष्य बताते हैं। इसपर धर्मकीर्ति ने “प्रमाणवार्त्तिक” नामक अपने ग्रन्थ( ग्रन्थ का प्रयोजन देखें—-प्रमाणवार्त्तिक,1/2) में उद्योतकर के आक्षेपों का उत्तर देते हुए पुनः बौद्ध पक्ष की प्रतिष्ठा करते हैं। इसके उपरांत न्याय के पक्ष से वाचस्पति मिश्र ने “न्यायवार्त्तिकतात्पर्यटीका” का प्रणयन किया और बौद्ध कुतार्किकों के दुस्तर पंक में निमग्न उद्योतकर की वार्ताओं के समुद्धार को अपने ग्रन्थ का प्रयोजन बताया।पश्चात् प्रत्युत्तर में प्रज्ञाकरगुप्त ने “प्रमाणवार्त्तिकालंकारभाष्य” की रचना की। साथ ही शान्तरक्षित ने”तत्वसंग्रह” की। जहां वे अन्य वैदिक दर्शन के सम्प्रदाय की भी परीक्षा लेते हैं। उदयनाचार्य “आत्मतत्वविवेक” नामक ग्रन्थ बौद्धों के खण्डन में लिखते हैं जिसकी प्रसिद्धि ‘बौद्धधिक्कार’ के रूप में हुई। प्रत्युत्तर में रत्नकीर्ति “उदयन निराकरणम्” नाम से स्वतंत्र ग्रन्थ लिखते हैं। भारतीय दर्शन के इस अप्रतिम खण्डन-मण्डन की परंपरा का यह प्रवाह यहीं आकर रूकता है,जिसे आगे प्रवाहित करने हेतु न्यायपक्ष की ओर से नवसृजन की आवश्यकता है।

नोट: प्रस्तुत पोस्ट कई पुस्तकों से सन्दर्भ लेकर लिखी गई है।

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