विनय-पिटक में ’भिक्षुणी’ संघ की भूमिका

-दीेपिका कुमारी *

प्रस्तावना:

बौद्ध दर्शन के तीन महत्वपूर्ण अंग है- बुद्ध, धम्म और संघ। बुद्ध में महात्मा बुद्ध के स्वंय के विचार एंव उपदेश है, धम्म में बुद्ध की शिक्षाएं है और संघ में बुद्ध की शिक्षाओं एंव उनके धर्म को व्यवहारिक जीवन में कैसे उतारा जाये व उनके आचार-नियमों का पालन कैसे हो वह स्थान है संघ। महात्मा बुद्ध ने अपने समय जब स्त्रियों की हालांत प्रत्यक्षतः देखी तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि इनके अधिकारों व सम्मान का समाज में एक स्थान नहीं हैं। इन्हीं स्त्रियों के अधिकार व उनके सम्मान दिलाने के लिए बुद्ध ने “भिक्षुणी संघ” की स्थापना की। ताकि उनके अधिकारों व सम्मान की सुरक्षा की जा सके। बौद्ध दर्शन के उपदेश एंव उनकी शिक्षाओं को समझने का महत्वपूर्ण सार है-त्रिपिटक अर्थात तीन पिटारी जो हैं- विनय पिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्म पिटक। इनमें से विनय पिटक और सुत्तपिटक महत्वपूर्ण पिटक है, जिसमें बुद्ध की शिक्षाऐं और धम्म हैं। विनय पिटक बुद्ध के आचार-नियमों का पिटक है, जिसमें भिक्षुणीयों के आचार एंव नियमों की बात कहीं कही गयी हैं। तीसरा पिटक अभिधम्म है जिसमें बुद्ध के उपदेशों को प्रश्नोंतरी के माध्यम से बताया गया है।

विनय पिटक के तीन भाग है- 1.सुत्तविभंग 2. खन्धक 3. परिवार। सुत्तविभंग में भिक्षु और भिक्षुणीयों के अलग-अलग नियमों एंव आचार की बात कही गयी हैं जिसमें भिक्षुओं के 227 और भिक्षुणीओं के 311 नियम हैं। इसमें भिक्षुणीयों के ये ज्यादा नियम संघ की सुरक्षा को लेकर है, क्योंकि शुरूआत में बुद्ध को इस बात का डर था कि- संघ की जो ब्रह्मचर्य स्थिरता है, कहीं भिक्षुणीओं के प्रवेश से टूट न जाये। चुल्लवग्ग में भी एक स्थान पर बुद्ध ने कहा है कि- जहां मेरा धर्म हजारों साल चलता वहां स्त्रियों के प्रवेश से कुछ ही साल चला। इसी उद्देश्य से महात्मा बुद्ध ने भिक्षुणी संघ में आठ नियम जोड़े ये आठ नियम है- 1. पाराजिक 2. संघादिसेस 3. अनिय धम्मा 4. निस्सग्गिया पाचितिवया 5. पाचितिवया धम्मा 6. पाटिदेसनिय 7. सेखिय 8. अधिकरण-समथ। आठवां नियम भिक्षुणीओं के अधिकार से है, क्योंकि बिना अधिकार के ये नियम नही चल सकते, इसलिए सात नियम इसके अन्तर्गत है।


सबसे पहले बुद्ध ने संघ की शुद्धि के लिए ’निदान’ की बात कही। निदान का अर्थ है-शील( साफ सफाई स्वच्छता को रखना) अर्थात भिक्षुणीओं के लिए जो कुछ धम्म व नियम बताए गये है जैसे- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह हैं। अहिंसा का अर्थ यहां केवल जीव हत्या ही नही इसके साथ अपने मन एंव विचारों को हिंसात्मक विचारों से दूर रखना भी है। दूसरा सत्य नियम है- जिसमें भिक्षुणी अपने स्वार्थ के लिए झूठ न बोले जो देखा है व सुना है उसे वैसे ही प्रत्यक्ष बोले। तीसरा अपरिग्रह है- जिसमें भिक्षुणी को किसी भी प्रकार के लोभ, लालच, मोह से दूर रहना बताया गया है, जितना है उसी में सन्तुष्ट रहे। निदान के बाद

बुद्ध ने आठ नियमों की विस्तारपूर्वक चर्चा कि है जो है:
प्रथम नियम ’पाराजिक’ है- इस नियम में भिक्षुणीयों के कामाशक्ति के नियंत्रण की बात कही गयी है जैसे कि, पुरूष स्पर्श, मैथुन संबध बनाना, अपनी दिव्यशक्ति का दावा करना इत्यादि। अर्थात इस नियम में बुद्ध का यही कहना है कि, भिक्षुणीयां इन सभी से परे जाये, क्योंकि ये नियम ब्रह्मचर्य के विरूध हैं।


दूसरा नियम ’संघादिसेस’ है- इसमें संघ की सुव्यवस्था के लिए बुद्ध ने भिक्षुणीओं के व्यवहार की बात की। जैसे कि भिक्षुओं की बात न मानना, एक-दूसरे की बुराई करना, संघ में फूट डालना, अकेले भिक्षा मांगने जाना, बिना बताये विहार करना आदि। इन सभी बुराईयों को संघ की अमर्यादा का कारण बताया गया है।


तीसरा नियम ’निस्सग्गिय पाचितिवया’- ’’जब तक अविद्या रहेगी तब तक मनुष्य के चित्त में स्थूल चीज़ो के प्रति लोभ, लालच रहेगा और उसका यही लोभ लालच सौन्द्रय वस्तुओं के प्रति ज्यादा रहेगा क्योंकि इनके खुशी के बारे में वह ज्यादा सोचेगा। ऐसे ही विचार वह अपने स्थूल शरीर के प्रति रखेगा’’। इसी अविद्या को नियत्रंण के लिए बुद्ध ने इस नियम में स्थूल चीजों से दूर रहना कहा है, क्योंकि यह क्षणिक है इनकी कोई स्थिरता नही है और जिनकी कोई स्थिरता ही नही, उनकी खुशी के बारे में क्या सोचना। भिक्षुणीयां क्यों अपने क्षणिक स्थूल शरीर को सौन्द्रर्य प्रसाधनों, भिन्न कपड़ो के बारे में सोचे जबकि ये ज्ञान को भटकाते है। संघ में जो चीवर (वस्त्र) ऋतुओं के अनुसार दे रखे हैं। (माहवारी, शीत-ग्रीष्म ऋतु के अलग आदि) केवल उन्हें धारण करे।


चतुर्थ नियम ’पाचितिवया’ है- इस नियम में किसी उपवास, वर्त आदि का निरोध किया गया है। क्योंकि बुद्ध का उद्देश्य केवल ज्ञान और सत्य पर जोर देना है, किसी उपवास या कर्मकाण्ड पर नही। इन्होंने केवल सात्विक भोजन करने, भोजन कैसे ग्रहण करे, कैसे बैठा जाये, भिक्षा कैसे लेने जाये उसके बारे में कहा है। क्योंकि (मनुष्य जैसा खायेंगा वैसा ही वह सोचेगा)। और इनका बस यही कहना है कि भिक्षुणीयां लहसुन न खाये, भोजन स्थिर आसन पर बैठकर करे, कुर्सी पलंग का इस्तेमाल न करे, पहले से ही भिक्षा लेने न बैठ न बाद में ज्यादा बैठे, जितना पात्र में आये उतना ही ग्रहण करे, सामुहिक भिक्षा लेने जावें। दूसरी बात भिक्षुणीयां कभी अपने शिक्षा को उद्योग न बनाये अगर वह नयी शिष्या को उपदेश दे रही है तो 5-6 से ज्यादा न दे ( यह बुद्ध के आत्मदीपो भवः से है, क्योंकि मनुष्य अपने ज्ञान का दीपक स्वंय प्रकाशित करता है, हमारे मार्गदशक के बाद अब वह खुद अपना मार्ग तय करेगा)।

पांचवा नियम ’पाटिदेसनिय’ इसमें आठ दोष है- यह नियम भिक्षावृति से संबधित है। इसमें बुद्ध ने बताया है कि-यदि कोई भिक्षुणी निरोगी है और वह फिर भी घी, दुध, मक्खन, दही, तेल आदि भिक्षा ले रही है तो वह पाटिदेसनिय दोष है अर्थातः इन चीजों के प्रति लोभ, लालच रखना संघ के नियमों के विपरित हैं।


छठा नियम ’सेखिय’ है- इसमें भिक्षुणीयों को 75 बाते सिखने की कही गयी हैं। जैसे कि-भिक्षु की बात को वह उक्कडू बैठकर सुने, अंजली मुद्रा में हाथ करे, दीक्षा देते वक्त शस्त्र-अस्त्रों को अपने पास न रखे, स्वस्थ रहते हुये भी खड़े-खड़े पेशाब न करे, खाना तरीके से खाना दांत न चटकाना, ग्रास से पहले मुहं न खोलना, खाते वक्त बाते न करना आदि ऐसे छोटे-छोटे नियम बुद्ध ने बताये है।


सांतवा नियम ’अधिकरण-समथ’ है- यह नियम वाद-विवाद से संबधित है। संघ सभी के अधिकारों का सम्मान करता है फिर चाहे वह पुरूष हो या स्त्री। लेकिन कई बार भिक्षुणी इस बात को भूल जाती है और अपने स्वंय के अधिकारों को लेकर वाद-विवाद करती है, जैसे कि- निन्दा करना, अपनी गलती को स्वीकार न करना, अमूढ़ व्याख्यान देना, झगडें का कारण न जानके पक्षपात सहित झगड़ा करना आदि। यह दोष संघ की एकता को समाप्त करते है। बुद्ध का उपदेश केवल ज्ञान, प्रेम, मैत्री, एकता का है। और जब संघ में मैत्री, प्रेम, एकता ही नही रहेगी तो आचार-नियम सब व्यर्थ है।


विनय-पिटक में जो बात महत्वपूर्ण है वह है कि यहा हर स्त्री को भिक्खुनी (भिक्षुणी) कहा गया है। भिक्षुणी का अर्थ स्त्री को सम्मान देना, इसी पर संघ के अलावा कुछ स्त्रियों की कथा पिटक के दूसरे भाग ’खन्धक’ में है जिसके दो भाग हे- महावग्ग और चुल्लवग्ग। महावग्ग में एक भद्रवर्गीय कथा है, जिसमें कहा गया है कि पहले तो पुरूष अपने मनोरंजन के लिए एक स्त्री को लाता है और वही स्त्री उनको बेहोश करके उनके आभूषण लेके भाग जाती हैं। और जब उनकी आंखे खुलती है, तो वह सभी उस स्त्री को ढूढ़ने चले जाते है और जब वह नही मिलती तो वह महात्मा बुद्ध के पास जाते है और अपनी व्यथा उन्हें सुनाते है। यह सुनकर बुद्ध ने कहते है कि- पहले तो अपने स्वंय की बुराई को ढूढ़ो, फिर उस स्त्री को। जिस अविद्या के कारण चित्त बुराई की तरफ भाग रहा है, उसे रोकने के लिए अच्छा है कि, चित्त को वहा से परिर्वतित कर लो। इस कथा का सार यही है कि एक भिक्षुणी से पहले एक भिक्षु के भी दोष है। और इन दोषोे (अधम्म व अविद्या) को वह पहचान नही पाता। बुद्ध ने सभी भिक्षु-भिक्षुणीयोे के पातिमोक्ख (प्रतिमोक्ष) का नियम बताया है- सभी भिक्षु हो या भिक्षुणीयां वह पहले अपने आप स्वंय को निर्वाण (निवृत) करें फिर बाद में अन्य को।


महावग्ग में ही कुछ त्यागी भिक्षुणीओं की भी कथाएं है- जैसे कि सुप्रिया नामक एक स्त्री ने एक रोगी की भूख को शान्त किया, अपने जांघ के मांस का टूकड़ा देके। और जब बुद्ध को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने इसे पाप दूषित कहा- ’कैसे एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के मांस का टूकड़ा खा सकता है’’ जबकि यह संघ के नियमों के विरूध है, लेकिन उस स्त्री को क्या पता कि किसी रोगी को अप्रसन्नता में भी प्रसन्नता देना कितना सुख का काम हैं।
महावग्ग में एक कथा महान गणिका आम्रपाली की है जब बुद्ध कोटिग्राम में विहार कर रहे थे। जब आम्रपाली को बुद्ध के आने की सूचना मिली तो वह एक सौंन्द्रय यान में वहां पहूंची और बुद्ध को भोजन के लिए आमंत्रित किया बुद्ध ने प्रसन्नतापूर्वक निमंत्रण स्वीकार कर लिया। इस निमंत्रण से गांव में चारों तरफ बुराई फेल गयी कि बुद्ध हमसे पहले इस गणिका के भोजन करेंगे, लेकिन ने इन सब बातों की परवा न करके बुद्ध ने आसनपूर्वक वहां भोजन किया। बाद में यही गणिका संघ में प्रवज्या ली। इस कथा का सार यही है कि, बुद्ध ने एक गणिका को समाज में उसको सम्मान दिलवाया। कुछ ऐसी ही पवित्र प्रेम करूणामयी स्त्री विशाखा की कथा है (वाराणसी की ‘महावग्ग’) में जिसने बुद्ध से भिक्षुओं के सेवा भार के लिए आठ वर मांगे। यह आठ वर थे- भिक्षुओं को ओर अधिक वस्त्र देना क्योंकि वर्षाकाल में जब भिक्षु नहाते थे तो वह नग्न नहाते थे क्योंकि वस्त्र सीमित थे। दूसरा वर नवांगतुको को भोजन कराना, रोगी को भोजन देना, संघ की सेवा आदि ये आठ वर उसने बुद्ध से मांगे और बुद्ध ने इनको स्वीकार करके संघ में विशाखा को प्रवज्या दी।
कुछ भिक्षुणी प्रेम करूणा के विपरीत लोभ, मोह वाली भी होती थी जो अपने सुख के लिए अपने शिशु तक को कुडे़ कचरे में फेकना पसन्द करती हैं। महावग्ग में राजगृह की ऐसी ही गणिका सालवत कुमारी थी जिसने अपने को अचिर( अन्य पुरूष के साथ वासना करके) उससे उत्पन्न शिशु को पात्र में रखके फेकना चाहा और जब वह पात्र कोंवे की चोच से नीचे गिरा तो उसे एक सभ्य राजकुमार अपने घर ले आया। बाद में वही शिशु तक्षशिला का तरूण महान वैद्य बना। अपने वासना के क्षणिक सुख आनन्द में वह स्वंय में इतना खो गयी थी कि, अपने शिशु की तड़प भी उसे नही देखी गयी।


चुल्लवग्ग में जैसा कि बुद्ध स्त्रीयों को प्रवज्या नही देना चाहते थे, क्योंकि उन्हें चिंता थी कि स्त्रीयां कैसे संघ के नित्य नियमों का पालन, ग्रहस्थी को त्यागना, बच्चों को छोड़ना ये कैसे कर सकती हैं। और उनकी चिंता करना सही भी है कि, एक स्त्री के लिए पहले परिवार है बाद में संघ। उनका (बुद्ध) का यही डर महाप्रजापति गौतमी को लेकर था, जब वह बुद्ध के पास प्रवज्या लेने आयी। बुद्ध ने वही आठ नियम महाप्रजापति को बताये जो उन्होंने अन्य भिक्षुणीयों को बताये थे। जब तक आयु हो तब तक संघ की सेवा करना, भिक्षुओ का अभिवादन करना, काम, क्रोध, मोह, लोभ, लालच से दूर रहना। ये आठ नियम प्रसन्नतापूर्वक महाप्रजापति ने स्वीकार कर लिये और उसे संघ में प्रवेश मिला। लेकिन फिर भी महाप्रजापति के चित्त में दुविधा थी कि संघ में कुछ नियम भिक्षुओं से अलग क्यों है समान क्यों नही और यही दुविधा वह बुद्ध के पास लेकर गयी। बुद्ध ने कहा-संघ के नियम वाचन, विनय वाचन, धम्म, कर्म प्रतिमोक्ष सभी के प्रथक-प्रथक है, बस उनका पालन वह ठीक से करे।


एक -एक करके भिक्षुणी को प्रवज्या देके बुद्ध ने संघ तो बना लिया, लेकिन अभी भी उनकी सुरक्षा को लेके उन्हें डर था, क्योंकि जंगल में एकान्त साधना में बलात्कार जैसी घटनाएं अक्सर होती रहती थी, इसी को ध्यान में रखकर बुद्ध ने कुछ नियम बनाये कि-सामुहिक साधना हो अकेले विचरण न करे तीन, पांच का समूह बनाये, एकान्त में किसी को बताके जाये।


बुद्ध ने एक अच्छा काम किया संघ बनाके लेकिन,भिक्षुणीयों के संघ में प्रवेश से गांव में तरह तरह की बाते भी होने लगी। भिक्षु जब भिक्षुणीयों को प्रवज्या देने या धम्म नियमों को उन्हें समझाने जाते थे, तो लोग भिक्षुणीयों को उनकी वैश्या, रखेलियां कई गालीया देते थे। कई भिक्षु तो अपने पुरूष अधिकार उन पर ज्यादा थोपते थे। अगर कोई भिक्षुणी भिक्षु को हाथ जोड़कर उकडू बैठकर प्रणाम भी करे तो, लोग फिर भी उसे ही गलत कहेंगे कि, जरूर इसने भिक्षु के साथ विहार करने से मना किया होगा। ऐसे कई गालियां भिक्षुणीयों को सुनने को मिलती थी।


निष्कर्ष:

विनय पिटक में भिक्षुणीयों के ये नियम आज के वर्तमान में हर स्त्री को बंदिशे लगे, लेकिन समाज में हर नारी चाहे वह ग्रहणी हो या वैश्या निम्न हो या उच्च उसे हर अधिकार व सम्मान दिया गया हैं। आज भी स्त्री अपनी सुरक्षा को लेकर डरती है वह अकेले जाने पर कई बार सोचती है। इसी पर बुद्ध ने भिक्षुणीयां का अलग संघ बनाया। जिससे उन्हें सम्मान मिल सके। बुद्ध ने भिक्षुओं के भी नियम बताये है विनय पिटक में, आज हर पुरूष यदि नियमों को भी अपने व्यवहार में लाये तो स्त्रियों की सुरक्षा हो सकती हैं। संघ हो या समाज दोंनो में भिक्षु-भिक्षुणीयां एक महासमुन्द्र समान प्रज्ञा, शील युक्त हैं। जैसे महासमुन्द्र स्थिर रहता है चाहे कितनी नदिया उसमें मिले वह अपने किनारे को कभी नही छोड़ता। वैसे ही संघ है, जिसमें एक स्थिरता है ज्ञान,शील,प्रेम,एकता की।


* सम्पर्क: kumarideepika213@gmail.com

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