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लाकडाउन में जीवन को भरपूर जीने की मनोवैज्ञानिक कुंजी

प्रख्यात अमेरिकी कलाकार एंडी वारहॉल का कथन है “हमेशा कहा जाता है कि समय चीजों को बदलता है, लेकिन आपको वास्तव में उन्हें खुद को बदलना होगा”. बतौर एक व्यावसायिक चित्रकार, कलात्मक चित्रकार, फ़िल्मकार, निर्माता, कारोबारी, पारखी और संरक्षक, वारहॉल ने कभी भी खुद को दायरों में सीमित नहीं किया, तथा जीवनपर्यंत नई विधाओं और माध्यमों से प्रयोग करते रहे. यद्यपि वारहॉल कि कृतियों में विविधता और नवीनता दिखती है, वे कभी भी मुख्यधारा से पृथक ना हुए, अपितु नित नए लोगों, कलाकारों, और सेलेब्रिटीज़ से उनका मिलना-जुलना लगा रहता था. उभरते, संघर्षशील और नवोर्जित रचनाकारों और कलाकारों को वे एक मंच व लॉन्चपैड प्रदान करते थे. इस प्रकार भांति-भांति के लोगों से वॉरहॉल का स्टूडियो गुलज़ार रहता था. वारहॉल की कृतियां प्रायः रोजमर्रा की जिंदगी में मिलने वाले आम वस्तुओं के माध्यम से हमारा जीवन के प्रति नज़रिया बदलने को प्रेरित करते हैं. वे सूप कैन से लेकर एक हैमबर्गर खाने के सामान्य से कार्य में कला, प्रेरणा और सौंदर्य खोजते हैं. तथाकथित साधारण चीज़ों और गतिविधियों की ध्यानपूर्वक सराहना करने और भरपूर आनंद लेने हेतु हमें आकर्षित करती है उनकी कला.


कोरोना काल हम सबके सब्र का इम्तिहान है. घर पर महीनों बंद रहकर हम निराशा और सामाजीय-भावनात्मक अभाव के अंतहीन प्रतीत होते दलदल में गहरे धंसते चले जा रहे हैं. अक्सर हमें तारीख बताने में दिक्कत पेश आती है, वासर स्मरण करना तो असंभव होता जा रहा है. किस दिनांक को क्या हुआ था ये सिर्फ महामारी से जुड़े बड़े व्यवधानों की रोशनी में याद रह गया है, मानों साल की लय ही टूट गई गत मार्च से. इंसानी सहज बोध को लगता है जैसे एक वर्ष से बाहर ना निकले हो पर कैलेंडर पर जुलाई देखकर लगता है कि अभी तो एक ऋतु ही पूरी हुई है – हमें क्या खबर हमें तो आसमान के दर्शन दुर्लभ हैं. दिन-प्रतिदिन चारदीवारी के दरमियान मंडराकर उत्साह की तितली के पर थक गए हैं. लगता है उसका विलोम-विकास हो जाएगा – कोकून में तो हम पहले ही बंद हो चुके है अब कमला (कैटरपिलर) वाले चरण में प्रवेश कर रहे हैं – क्षुधा, आहार, सहमना व विवशता तो देखिए. ऐसे में कैसे जीवन यापन किया जाये कि इस महामारी के पश्चात हमे कोई अफसोस ना रहे की हमारे जीवन का एक अहम खंड यूं ही कट गया. 


हम सब जीवन के इस अवलोकन से भली-भांति परिचित हैं कि प्रिय काम में तल्लीन और मशगूल होने पर हमे समय का तनिक भी भान नहीं रहता है और यूं प्रतीत होता है मानो घंटों में मिनटों के एहसास पार हुए हों. वहीँ कोई कष्टप्रद अथवा उबाऊ क्रिया करने पर हमें लगता है कि घंटों बीत गए मिनटों के दरमियान.
परंतु जितना सत्य ये है, उतना ही वाजिब यह पहलू भी है कि किसी लंबे, नीरस, एक-से काम को करने पर कुछ समय के पश्चात हमें लगता है मानो हमने कुछ ना किया हो. यादों के तौर पर कुछ खास नहीं रहता और याददाश्त पर ज़ोर डालने के बावजूद हमें कोई अनुभूति नहीं होती तथा अन्तराल का भेद धुँधलाने लगता है. दिन, हफ्ते, और महीने एक से मालूम पड़ते हैं. अत्याधिक एकनिष्ठ, लयबद्ध कार्य करते रहने से हमारी स्मृति-जनन की प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है तथा हमारी अनुभूति क्षीण होती है.


उम्र बढ़ने के साथ समय त्वरित गति से बीतता प्रतीत होता है. वृद्धावस्था तो दूर, व्यस्क होते ही यह जान पड़ता है कि बाल्यकाल के ब्रह्मदिवस-सम दिन अब क्षणभंगुर अनुभवों की एक लड़ी मात्र बन कर रह गए हों. बचपन की हर एक याद स्मृति-पटल पर शिलालेखों तथा अमित छापों की तरह इंगित रहती है. कुछ यादें तो एक चलचित्र की भांति अहसा ही चलना शुरू हो जाती हैं. दूसरी ओर एक बुजुर्ग जो अपने बचपन व यौवन के किस्से हर एक बारीकी सटीकता से गिनाते हुए घंटों बयां कर सकता है, बीती रात उसने अपना चश्मा कहा रखा था या दवा ली थी या नहीं, बताने में खुद को अक्षम महसूस करता है. 


इस सन्दर्भ में वैज्ञानिक मत ये है कि चूंकि मानव मस्तिष्क की समय की अनुभूति सापेक्ष है इसलिए उम्र बढ़ने के साथ-साथ हमारे समय का माप बीते समय के पूर्व-परिप्रेक्ष्य में संकुचित होता जाता है. इस तरह एक विकासशील गैर-रेखीय, असमानुपात मापदण्ड की कसौटी पर अपने अनुभवों को कसने पर सबसे शुरुआती अनुभव सबसे लंबे लगते हैं. जैसे जैसे हमारे दिमाग का दुनियावी अनुभवों और कुदरत के नियमों, विशिष्टताओं, और लयों से परिचय बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे वह मामूल, पुनरावृत्तित, तथा दोहराए जाने वाले महीनियों व बारीकियों का अभ्यस्त होकर के अनदेखी करता है. इसी से समय सिकुड़ने का आभास होता है. मनोविज्ञान के अनुसार यादों को पुनः-पुनः आवृत्त करने से वे ताज़ा बने रहते हैं. किसी भी अनुभव के तुरंत बाद उसपर गहनता से मनन व चिंतन करने से वह याद्दाश्त में ठोस हो जाता है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह एक पृष्ठ स्याही को सोख लेता है.


मूलतः इन दोनों के में एक कारक सामान्य है – एक ही कृत्य बारम्बार करने पर एवं उम्र के प्रभाव से विभिन्न कालखण्डों का भेद मिटना – दोनों हीं हमारे मस्तिष्क के किसी लय को आदि होकर अपनी चुस्ती और संवेदनशीलता खोने की अभिव्यक्तियाँ हैं जिसके नतीजतन हमारा जीवनकाल गैर-रेखीय प्रतीत होता है.
कोरोना काल में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यही उचित है कि घर के अंदर ही आप विभिन्न योग-प्रयोग करें, नई चीजों पर हाथ आजमाए, वो जो आप हमेशा से करना चाहते थे और कुछ वो भी जिनसे आप अनभिज्ञ हैं. अपने दिमाग को नित नए चैलेंज दे और कम्फर्ट-ज़ोन से बाहर निकालें. हर सुबह कुछ नया करेंगे तो शायद आप दिनांक ना भूलें.


एक दैनंदिनि अवश्य रखें जिसके माध्यम से आप अपने अनुभवों को न केवल उसके पृष्ठों में ब्लकि अपने मस्तिष्क में चिर-कालिक पिरो सकें. याद रखें आपकी वास्तविकता को आकार देने में आपकी भूमिका सर्वोपरि है. समय और मानव मन दोनों अति गतिशील हैं, पर समय अनवरत चलता है, मन नहीं. काल की डगर पर मन के घोड़े को कब और कहां बांधना है ये पूर्णतः स्वयं आपपे निर्भर है.

लेखक: पीताम्बर कौशिक 
(लेखक एक पत्रकार, स्तंभकार, व शोधकर्ता हैं)

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