एकांत से कैवल्य तक : कोरोना काल में जैन दर्शन की प्रासंगिकता

जैन दर्शन में कैवल्य का स्थान सर्वोपरि है। जैन दर्शन के अनुसार जीव का लक्ष्य कैवल्य अवस्था को प्राप्त करना ही है, इस अवस्था के प्राप्त होने पर जीव सर्व सुखी हो जाता है, जिसे जैन दर्शन में अनंत सुख शब्द से अभिहित किया गया है। अरिहंत और सिद्ध अवस्था ही ऐसी अवस्था है जहाँ पर जीव कैवल्य के चरम को प्राप्त हो जाता है। सुख की खोज में न मात्र मनुष्य अपितु जीव मात्र अहर्निश प्रयत्नशील रहता है, किंतु सुख प्राप्ति के उपाय विपरीत होने के कारण वह दुखों की ओर ही बढ़ता चला जाता है। जैन मान्यता के अनुसार रत्नत्रय का मार्ग ही सुख की खोज का सर्वोत्तम उपाय है। श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र जब तक सम्यक नहीं हो जाते तब तक जीव कैवल्य स्वरूप की पहचान नहीं कर सकता। कैवल्य की पूर्णता अरिहंत और सिद्ध अवस्था में होती है किंतु इसका प्रारम्भ चतुर्थ गुणस्थान से हो जाता है, जहाँ पर जीव की श्रद्धा मिथ्या से सम्यक् हो जाती है।

Article Socio-Political

The Necessity of ‘STATE’ for ‘HAPPINESS’

-By Shantaraj Debbarma Economic and social development cannot be possible without political institution. For promoting happiness we need some law. And law should be clear and intelligible so that all can understand it. The laws should not be contradicting to each other. We need institution for maintaining and enforcing these laws. The role of the […]


Science is uprooting Free Will from Governance

-By Pitamber Kaushik Choice is one of the most fundamental assumptions of most classical thought and belief systems whether it be treated as a valuable gift or a taken-for-granted unavoidable naturality. The belief in the independence of one’s action and the consequent responsibility, answerability, and accountability for the same constitutes the cornerstone of our social […]

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