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बौद्ध और न्याय की दार्शनिक सहयात्रा

-अनुराधा मलाती भारतीय दार्शनिक चिंतन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी खण्डन-मण्डन की परंपरा रही है। इसी खण्डन-मंडन के परिणामस्वरूप सूत्र, भाष्य, वार्तिक, टीका एवं प्रकरणादि ग्रन्थों के माध्यम से भारतीय परंपरा में व्याख्याओं, पुनर्व्याख्याओं से दर्शन की यात्रा, उसका विकास युक्तियुक्त रूप से अनवरत वर्द्धमान रही है। इसमें न्याय और बौद्ध विचारधारा के मध्य एक […]

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लाकडाउन में जीवन को भरपूर जीने की मनोवैज्ञानिक कुंजी

रख्यात अमेरिकी कलाकार एंडी वारहॉल का कथन है “हमेशा कहा जाता है कि समय चीजों को बदलता है, लेकिन आपको वास्तव में उन्हें खुद को बदलना होगा”.

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गौतम बुद्ध पारंपरिक या मौलिक ?

गौतम बुद्ध पारंपरिक नहीं, मौलिक हैं। गौतम बुद्ध किसी परंपरा, किसी लीक को नहीं पीटते हैं। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि अतीत के ऋषियों ने ऐसा कहा था, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि वेद में ऐसा लिखा है, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि मैं कहता हूं इसलिए मान लो। वे कहते हैं, जब तक तुम न जान लो, मानना मत।

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कोविड- 19, वर्गवाद एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

इस धरती का सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य अपने द्वारा बनाई गई व्यवस्थाओं को देखकर गर्व करता है और उस पर इतराता है। परंतु यही गर्व जब घमंड में परिवर्तित हो जाता है जब वह प्रकृति द्वारा बनाई गई व्यवस्था को चुनौती देने लगता है और प्रकृति के नियमों में बाधा उत्पन्न करता है।