Article

एकांत से कैवल्य तक : कोरोना काल में जैन दर्शन की प्रासंगिकता

-अनुभव जैन

प्रस्तावना – भारतीय दर्शनों में मोक्ष और मोक्षमार्ग दोनों का ही विस्तृत एवं व्यापक वर्णन प्राप्त होता है। चार्वाक मत में मोक्ष आदि का कोई स्थान नहीं है, शेष बहुधा दर्शनों में किसी न किसी रूप में मोक्ष आदि की व्यवस्था का वर्णन प्राप्त होता है। भारतीय दार्शनिक विचारक भी रहे हैं और साधक भी रहे हैं। किंतु, जिस मात्रा में वे साधक रहे हैं उस मात्रा में वे विचारक नहीं रहे, जो कि भारतीय दर्शन की कमजोरी नहीं वरन् विशेषता है। जो मात्र विचारक होता है वह सैकड़ों विचारों से भरा होने पर भी खोखला ही होता है। वह अपने विचारों से मार्ग प्रदर्शित तो कर सकता है; किंतु, स्वयं ही उसमार्ग के गंतव्य की प्राप्ति में असमर्थ होता है। साधक सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व है। सम्भव है साधक के पास उतने विचारों का सैलाब न हो जितना संग्रह एकविचारक के पास होता है, किंतु फिर भी साधक अपनी साधना से जगत के सभी विचारों के मूल को देख सकने में समर्थ होता है। भारतीय ऋषि एककुशल विचारक तो रहे ही हैं, किंतु इसी के साथ वे सर्वोत्तम साधक भी थे। उनके विचार सिर्फ़ संसार के तत्वों की खोज के लिए कार्यरत नहीं थे, अपितु उनका मूल उद्देश्य तो स्वयं की खोज करना था। बुद्ध और महावीर का लक्ष्य जगत को मार्ग दर्शाना नहीं था, अपितु स्वयं के दर्शन करना था। साधक की साधना के फल से ही विचारों का उद्भव होता है, और इन्हीं विचारों से दर्शनों का जन्म। साधक कि साधना का प्रारम्भ भी एकांत से होता है और अंत भी एकांत पर।

कैवल्य दशा की प्राप्ति एक विचारक के वश की बात नहीं है। विचारक कड़क चने को चबा सकता है किंतु गरिष्ठ घी को पचा नहीं सकता। साधक हीकैवल्य दशा को प्राप्त होता है। वह कड़क चनों को चबाने में अपने समय को व्यर्थ नहीं गँवाता, अपितु घी जैसे मूल तत्त्व को पचाने के लिए उद्यमरत रहता है। विचार चने के समान हैं और साधना जिसे हम यहाँ पर कैवल्य के साथ जोड़कर देख रहे हैं वह घी के समान है।

मार्ग अथवा गन्तव्य – सतत्-कैवल्य दशा साधना की दशा नहीं है, अपितु साधना के फल की दशा है। कैवल्य के मार्ग में जीवात्मा स्वयं की खोजकरता है, मार्ग मिल जाने पर उस पर चलता है, किंतु मार्ग गंतव्य नहीं है, गंतव्य तो कैवल्य है। ऐसा गन्तव्य जहाँ कैवल्य स्वरूप का भी विकल्प नहीं रहता। वहाँ पर एक मात्र सुख की ही अनुभूति रहती है। जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में कैवल्य का क्या स्वरूप है, इसके संदर्भ में यहाँ कतिपय निरूपण किया जा रहा है।

जैन दर्शन में कैवल्य का स्वरूप– कैवल्य एक परिपूर्ण अवस्था का नाम है, ऐसी अवस्था जहाँ पर ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य अनंतता को प्राप्त हो गए हैं। ऐसी अवस्था जहाँ स्वरूप विकारों से रहित हो गया है। ऐसी अवस्था जहाँ निर्मलत्व का साम्राज्य व्याप्त है। इस तरह की अवस्था सम्पूर्ण कैवल्य अवस्था कहलाती है। केवल विशेषण से युक्त अवस्था कैवल्य है। केवल शब्द स्वरूप की उस चरम पवित्रता का सूचक है, जहाँ पर एक मात्र एक ही निवास करता है। एक के साथ अन्य होने पर विकार उत्पन्न होता है और केवलत्व नष्ट हो जाता है। जैन दर्शन में केवलज्ञानी की अवस्था सम्पूर्णकैवल्य के युक्त है। जैन मन्यतानुसार पाँच परमेष्ठियों में से अरिहंत और सिद्ध केवलज्ञानि होते हैं, और वे ही सम्पूर्ण कैवल्य अवस्था के धारी होते हैं।

जैन दर्शन के अनुसार अरिहंत का स्वरूप– जैन धर्म में मान्य पाँच परमेष्ठियों में प्रथम स्थान पर अरिहंत परमेष्ठी का स्मरण किया गया है। पद केअनुसार तो सिद्ध परमेष्ठी अरिहंत से उच्च पद पर हैं किंतु उपकार की दृष्टि से अरिहंत को सर्वत्र साहित्य में प्रथमत: स्मरण किया गया है। पण्डितटोडरमल मोक्षमार्ग प्रकाशक नामक ग्रंथ में अरिहंत के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि –

अरहंतों का स्वरूप– वहाँ प्रथम अरहंतों के स्वरूप का विचार करते हैंः – जो गृहस्थपना त्यागकर, मुनिधर्म अंगीकार करके, निजस्वभावसाधन द्वारा चारघातिकर्मों का क्षय करके – अनंतचतुष्टयरूप विराजमान हुए; वहाँ अनंतज्ञान द्वारा तो अपने अनंतगुण-पर्याय सहित समस्त जीवादि द्रव्यों को युगपत्विशेषपने से प्रत्यक्ष जानते हैं, अनंतदर्शन द्वारा उनका सामान्य अवलोकन करते हैं, अनंतवीर्य द्वारा ऐसी सामर्थ्य को धारण करते हैं, अनंतसुख द्वारा निराकुल परमानन्द का अनुभव करते हैं। पुनश्च, जो सर्वथा सर्व राग-द्वेषादि विकारभावों से रहित होकर शांतरसरूप परिणमित हुए हैं; तथा क्षुधा-तृषादिसमस्त दोषों से मुक्त होकर देवाधिदेवपने को प्राप्त हुए हैं; तथा आयुध-अंबरादिक व अंगविकारादिक जो काम-क्रोधादि निंद्यभावों के चिह्न उनसे रहितजिनका परम औदारिक शरीर हुआ है; तथा जिनके वचनों से लोक में धर्मतीर्थ प्रवर्तता है,  जिसके द्वारा जीवों का कल्याण होता है; तथा जिनके लौकिक जीवों को प्रभुत्व मानने के कारणरूप अनेक अतिशय और नानाप्रकार के वैभव का संयुक्तपना पाया जाता है; तथा जिनका अपने हित के अर्थगणधर – इन्द्रादिक उत्तम जीव सेवन करते हैं। ऐसे सर्वप्रकारसे पूजने योग्य श्री अरहंतदेव हैं, उन्हें हमारा नमस्कार हो।[1]

आचार्य कुंदकुंद देव द्वारा रचित अष्टपाहुड के अंतर्गत बोधपाहुड में अरिहंत के स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है, जो कुछ इस प्रकार है – 

सम्मद्दंसणि पस्सदि जाणदि णाणेण दव्वपज्जाया 

सम्मत्तगुणविशुद्धो भावो अरहस्स णायव्वो ।।41।।[2]

अर्थ – `भाव अरहंत’ सम्यग्दर्शन से तो अपने को तथा सबको सत्तामात्र देखते हैं,  इसप्रकार जिनको केवलदर्शन है,  ज्ञान से सब द्रव्य-पर्यायों को जानतेहैं, इसप्रकार जिनको केवलज्ञान है, जिनको सम्यक्त्व गुण से विशुद्ध क्षायिक सम्यक्त्व पाया जाता है, इसप्रकार अरहंत का भाव जानना।

जैन दर्शन के अनुसार सिद्ध का स्वरूप– सिद्ध सबसे उच्च अवस्था का नाम है, जिसे हम आत्मा की मूल अवस्था भी कह सकते हैं। क्योंकि वहाँआत्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं रहता है।  अरिहंत अवस्था में अनंतपने के प्राप्ति के बावजूद शरीर का संयोग अघाति कर्मों के सद्भाव के कारण रहता है;  किंतु, कैवल्य में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहती, कारण कि घाति कर्म का अभाव उस अवस्था में पाया जाता है। पण्डित टोडरमल सिद्ध के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि-

सिद्धों का स्वरूप– अब, सिद्धोंका स्वरूप ध्याते हैं:- जो गृहस्थ- अवस्था को त्यागकर, मुनिधर्मसाधन द्वारा चार घातिकर्मों का नाश होने पर अनंतचतुष्टय स्वभाव प्रगट करके, कुछ काल पीछे चार अघातिकर्मों के भी भस्म होने पर परम औदारिक शरीर को भी छोड़कर ऊर्ध्वगमन स्वभाव सेलोक के अग्रभाग में जाकर विराजमान हुए; वहाँ जिनको समस्त परद्रव्यों का सम्बन्ध छूटने से मुक्त अवस्था की सिद्धि हुई, तथा जिनके चरम शरीर सेकिंचित् न्यून पुरुषाकारवत् आत्मप्रदेशों का आकार अवस्थित हुआ, तथा जिनके प्रतिपक्षी कर्मों का नाश हुआ इसलिये समस्त सम्यक्त्व- ज्ञान-दर्शनादिक आत्मिक गुण सम्पूर्णतया अपने स्वभाव को प्राप्त हुए हैं, तथा जिनके नोकर्म का सम्बन्ध दूर हुआ, इसलिये समस्त अमूर्त्तत्वादिक आत्मिकधर्म प्रगट हुए हैं, तथा जिनके भावकर्म का अभाव हुआ, इसलिये निराकुल आनन्दमय शुद्धस्वभावरूप परिणमन हो रहा है; तथा जिनके ध्यान द्वारा भव्यजीवों को स्वद्रव्य- परद्रव्य का और औपाधिकभाव- स्वभावभावों का विज्ञान होता है, जिसके द्वारा उन सिद्धों के समान स्वयं होने का साधन होता है। इसलिये साधने योग्य जो अपना शुद्ध स्वरूप उसे दर्शाने को प्रतिबिम्ब समान हैं तथा जो कृतकृत्य हुए हैं, इसलिये ऐसे ही अनंतकाल पर्यंत रहते हैं।- ऐसे निष्पन्न हुए सिद्धभगवान को हमारा नमस्कार हो।[3]

जैन दर्शन की कैवल्य अवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अन्वेषण– ऊपर की गयी मीमांसा के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि covid-19 जैसी विषम परिस्थितियों में जैन दर्शन की कैवल्य अवस्था किसी भी रूप में उपयोगी नहीं है, कारण कि यह तो सम्पूर्ण ज्ञान अथवा सुख होने पर ही प्राप्त होती है। किंतु, प्रस्तावना पर्यंत गंतव्य के साथ साथ मार्ग की भी चर्चा की गयी थी। उसके अनुसार जैन दर्शन की भूमि में ऐसी विषम परिस्थिति से सामना करना सच्चे जैन के लिए बालवत् कार्य है। इस विषय को समझने के लिए जैन दर्शन के विभिन्न दृष्टिकोणों से इस संदर्भ में विचार करनाआवश्यक है।

सम्यक्दर्शन की प्राप्ति– मोक्षमार्ग का प्रारम्भ सम्यक्दर्शन से होता है। दर्शन का अर्थ देखना न होकर श्रद्धान से है। यदि श्रद्धा मिथ्या है तो अनुकूलपदार्थों का संयोग होने पर भी जीव सुखी नहीं हो सकता। और यदि श्रद्धा सम्यक् है तो प्रतिकूल पदार्थों का संयोग भी जीव को दुखी नहीं कर सकता। जैन मुनि जंगलों में रहा करते थे, वहाँ पर उनके ऊपर अनेकों प्रकार के उपसर्ग भी होते थे, शेर आदि जंगली पशु नित्य ही वहाँ विचरण किया करते थे, किस भी ऋतु में वे वस्त्र धारण नहीं करते थे, उनके पास जगत की कोई भी सामग्री नहीं होती थी, किंतु वे दुखी नहीं थे अपितु मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ सुखके धारी थी। वहीं दूसरी ओर, महलों में रहने वाले राजा, जिनके हज़ारों सेवक, लाखों सैनिक, अनेकों पत्नियाँ, अमूल्य निधियों के भण्डार और न जानेक्या क्या संयोग साथ हुआ करते थे किंतु वे फिर भी दुखी ही थे, आक़ुलित थे, परेशान थे और सुख की खोज करते रहते थे। आख़िर उन नग्न मुनिराजों के पास ऐसा क्या था कि इनके पास कुछ न होने पर भी वे सर्वाधिक सुखी थे और महलों में रहने वाले राजा दुखी? यह अंतर श्रद्धा का ही था। मुनिराजों की दृष्टि में जगत की सम्पदा काक की विष्टा के समान थी, उन्हें महलों के भोग रोग के समान प्रतीत होते थे, वे एक मात्र स्वयं की साधना मेंरत थे और यही कारण था कि उन्होंने सम्यक् श्रद्धा के बल पर सुख अथवा कैवल्य के उस मार्ग को खोज निकाला जिसके ऊपर आरूड़ होकर वे कैवल्यदशा को प्राप्त हो जाएँगे।

Covid-19 हमारे लिए बहुत ही बड़ा संकट सा प्रतीत हो रहा है, किंतु मनुष्य ने ऐसे अनगिनत संकटों को सहा है, और उनसे उभर कर जीवन की जिजीविषा को जीवित रखा है। मुद्दा यह नहीं है कि सिर्फ़ इस परिस्थिति में हम संयम अथवा सुख से कैसे रहें? मुद्दा इससे बहुत ही बड़ा है। यह एक छोटी सी विषम परिस्थिति एक बहुत बड़े उद्देश्य को उजागर करती है। मनुष्य विज्ञान के विकास में इतना आतुर और मूढ़ हो गया है कि कि स्वयं के स्वभाव को भूल ही गया। हम सिर्फ़ दिखावे का जीवन जीने लगे हैं, जीवन के मूल उद्देश्य को तो भूल ही गए हैं, हम भूल गए हैं कि हम मशीन नहीं हैं, हम वे प्राणी है जो सुख के उस चरम तक पहुँच सकते हैं जहाँ सुख की खोज ही समाप्त हो जाती है। जैन दर्शन जीवन जीना सिखाता है न की मात्रविषम परिस्थिति में जीवित रहना। सम्यक्दर्शन सुखी होने की वह शुरुआत है जो जीव को उसके गंतव्य पर पहुँचाकर ही विश्राम लेती है। कैवल्य केस्वरूप की झलक सम्यक्दर्शन की प्राप्ति में आ जाती है। जीव जगत में रहते हुए भी जगत से भिन्न हो जाता है। मिथ्या श्रद्धा नाव में पानी के समानअवस्था का नाम है जबकि सम्यक् श्रद्धा पानी में नाव के समान अवस्था का नाम है। जीवन दोनों में ही है किंतु एक में अकुलता है और दूसरे में निराकुलता।

सप्त भयों से रहित अवस्था– यदुदयादुद्वेगस्तद्भयम्[4]। जिसके उदय से उद्वेग होता है वह भय है। भय सात प्रकार के होते हैं। इहपरलोयत्ताणंअगुत्तिमरणं च वेयणाकिस्सि भया।[5] इसलोक भय,  परलोक, अरक्षा, अगुप्ति, मरण, वेदना और आकस्मिक भय इस तरह भय के सात भेद हैं। सम्यक्दृष्टि इन सातों भयों से रहित होता है। प्रकरण में इसलोक भय, परलोक भय, मरण भय और आकस्मिक भय प्रासंगिक है। जिनका स्वरूप कुछ इस प्रकार है- मेरे इष्ट पदार्थ का वियोग न हो जाये और अनिष्ट पदार्थ का संयोग न हो जाये इस प्रकार इस जन्म में क्रन्दन करने को इहलोक भय कहते हैं।[6] परभव में भावि पर्यायरूप अंश को धारण करने वाला आत्मा परलोक है और उस परलोक से जो कंपने के समान भय होता है, उसको परलोकभय कहते हैं। यदि स्वर्ग में जन्म हो तो अच्छा है, मेरा दुर्गति में जन्म न हो इत्यादि प्रकार से हृदय का आकुलित होना पारलौकिक भय कहलाता है।[7] मैं जीवित रहूँ, कभी मेरा मरण न हो, अथवा दैवयोग से कभी मृत्यु न हो, इस प्रकार शरीर के नाश के विषय में जो चिन्ता होती है, वह मृत्युभय कहलाताहै।[8] अकस्मात् उत्पन्न होने वाला महान् दुःख आकस्मिक भय माना गया है। जैसे कि बिजली आदि के गिरने से प्राणियों का मरण हो जाता है। जैसे मैं सदैव नीरोग रहूँ, कभी रोगी न होऊँ, इस प्रकार व्याकुलित चित्तपूर्वक होने वाली चिन्ता आकस्मिक भीति कहलाती है।[9]

ज़रा विचार कीजिए जिसे न तो इस लोक का भय हो, न ही पर लोक का, न तो मृत्यु का भय हो न ही अकस्मात् हो जाने वाले संकट का, भला उसेकोरोना जैसे रोगों का क्या भय होगा? भय का अभाव कैवल्य की साधना से प्रारम्भ होता है, और सम्पूर्ण सुख की प्राप्ति कैवल्य की साधना के परिपूर्णहोने पर होती है। इस तरह जैन दर्शन में कैवल्य का स्थान सर्वोपरि है, जो कोरोना जैसे छोटे मोटे संकटों से तो हमें पार उतारता ही है, साथ ही साथ संसार के चक्र से मुक्त होने का मार्ग भी नित्य प्रशस्त करता है।


संदर्भित ग्रंथ सूची – 

  • कुंदकुंद. (1942). बोधपाहुड अष्टपाहुड के अंतर्गत (प्रसादजगत, अनुवादक)। दिल्ली: भारतवर्षीय अनाथरक्षक जैन संघ.‌
  • टोडरमल. (1983). मोक्षमार्ग प्रकाशक (भारिल्लहुकमचंद, सम्पादक.)। जयपुर: श्री कुंदकुंद कहान तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट.
  • पाण्डेराजमल. (1918). पंचाध्यायी (उत्तरार्ध) (शास्त्रीमाखनलाल, सम्पादक.)। इंदौर: ग्रंथप्रकाशक कार्यालय.
  • पूज्यपाद. (1997). सर्वार्थसिद्धि (शास्त्रीकैलाश चंद्र, सम्पादक एवं अनुवादक.)। नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ.
  • वट्टकेर. (2020). मूलाचार आचारवृत्ति के साथ, आचार्य वसुनन्दी सिद्धांतचक्रवर्ती संस्कृत टीका (भाग. 1; शास्त्रीकैलाश चंद्र,शास्त्रीपन्नालाल, शास्त्रीजगनमोहन लाल, सम्पादक० आर्यिकारत्नज्ञानमती, अनुवादक.). नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ.‌


[1] मोक्षमार्ग प्रकाशक, अधिकार 1, पेज –  2

[2] बोधपाहुड गाथा 41

[3] मोक्षमार्ग प्रकाशक, अधिकार 1, पेज –  2

[4] सर्वार्थसिद्धि/8/9/386/1

[5] मू.आ./53

[6] पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/ श्लोक नं. 506 

[7] पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/ श्लोक नं. 516-517 

[8] पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/ श्लोक नं. 540

[9] पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/ श्लोक नं. 543-544

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.